सड़क के इंतजार में सूना होता गांव: कभी 40 परिवारों की चहल-पहल, अब ग्रामीण खुद काट रहे सड़क

चमोली। पहाड़ों में विकास की सबसे बड़ी पहचान सड़क को माना जाता है। सड़क पहुंचती है तो गांव तक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार की राह आसान होती है, लेकिन सड़क न होने पर धीरे-धीरे गांव की रौनक भी कम होने लगती है। कर्णप्रयाग विकासखंड की न्याय पंचायत झिरकोटी क्षेत्र का एक गांव आज इसी कहानी को बयां कर रहा है। यहां कभी 30 से 40 परिवारों की चहल-पहल हुआ करती थी, बच्चों की आवाज से प्राथमिक विद्यालय गूंजता था और खेतों में लोगों की मेहनत से हरियाली दिखाई देती थी। लेकिन सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव ने समय के साथ इस गांव की तस्वीर बदल दी।
आजादी के करीब 80 वर्ष बाद भी गांव तक सड़क नहीं पहुंच पाई है। ग्रामीणों को आज भी मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए करीब 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। वर्षों तक सड़क की मांग करने के बाद भी जब कोई ठोस समाधान नहीं निकला तो आखिरकार ग्रामीणों ने अपनी मजबूरी को ही ताकत बनाते हुए स्वयं सड़क की कटिंग शुरू कर दी। यह केवल सड़क काटने का काम नहीं है, बल्कि उन ग्रामीणों की उम्मीदों और संघर्ष की कहानी है, जो अपने गांव को खाली होने से बचाना चाहते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क का अभाव गांव की सबसे बड़ी समस्या है। रोजमर्रा के जीवन की छोटी से छोटी जरूरत के लिए भी लंबी पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना हो, बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए बाहर जाना हो या फिर राशन और अन्य आवश्यक सामान गांव तक लाना हो, हर काम कठिन बन जाता है।
पहाड़ की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में 10 किलोमीटर पैदल चलना कोई आसान बात नहीं है। बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और बीमार लोगों को सबसे अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बरसात और खराब मौसम के दौरान यह समस्या और अधिक गंभीर हो जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि यही कारण है कि धीरे-धीरे कई परिवार गांव से पलायन कर चुके हैं। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजगार की तलाश में लोग गांव छोड़कर शहरों और सड़क से जुड़े क्षेत्रों में बसने लगे। एक समय 30 से 40 परिवारों की आबादी वाला गांव आज सुविधाओं के अभाव और पलायन की मार झेल रहा है।
सरकार से उम्मीद टूटी तो ग्रामीणों ने खुद संभाली कमान
ग्रामीणों का कहना है कि गांव तक सड़क पहुंचाने की मांग लंबे समय से की जा रही है। लोगों ने समय-समय पर शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के समक्ष अपनी समस्या रखी, लेकिन अब तक सड़क का सपना पूरा नहीं हो सका। आखिरकार वर्षों के इंतजार के बाद ग्रामीणों ने स्वयं ही पहल करने का निर्णय लिया और गांव तक सड़क पहुंचाने के लिए कटिंग का कार्य शुरू कर दिया।
ग्रामीणों का यह कदम उनकी बेबसी के साथ-साथ उनके दृढ़ संकल्प को भी दर्शाता है। सड़क के लिए सरकार और विभागों की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखने वाले ग्रामीण अब अपने श्रम और आपसी सहयोग के दम पर रास्ता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका सवाल है कि जब पहाड़ के अधिकांश गांवों तक सड़क पहुंच चुकी है, तो आखिर उनका गांव अब तक इस सुविधा से क्यों वंचित है? सड़क सुविधा न होने के बावजूद गांव के लोगों ने अपनी जमीन और खेती को नहीं छोड़ा है। गांव की उपजाऊ भूमि और अनुकूल जलवायु में सेब, आलू, चौलाई और राजमा की खेती अच्छी होती है।
विशेष रूप से यहां का राजमा अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और स्वाद के लिए जाना जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, गांव में उत्पादित राजमा स्वादिष्ट होने के साथ अच्छी गुणवत्ता का होता है। यदि इस स्थानीय उत्पाद को बेहतर बाजार और पहचान मिले तो यह ग्रामीणों की आय का मजबूत स्रोत बन सकता है।
इसी प्रकार सेब की बागवानी की भी यहां अच्छी संभावनाएं हैं। आलू और चौलाई की खेती भी किसानों के लिए महत्वपूर्ण है। पहाड़ की मिट्टी और जलवायु इन फसलों के अनुकूल है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तैयार उपज को बाजार तक पहुंचाने की है।
खेतों से उपज तो निकलती है, बाजार तक पहुंचाना चुनौती
किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या उत्पादन नहीं, बल्कि उसे बाजार तक पहुंचाना है। गांव तक सड़क नहीं होने के कारण तैयार फसल को पहले लंबी दूरी तक पैदल ढोना पड़ता है। सेब, आलू, चौलाई और राजमा जैसी फसलों को बाजार तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को अतिरिक्त श्रम और खर्च करना पड़ता है। इससे किसानों की लागत बढ़ जाती है और कई बार उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांव तक सड़क पहुंच जाए तो खेती-किसानी की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। कृषि यंत्र, खाद और अन्य जरूरी सामग्री आसानी से गांव तक पहुंच सकेगी। वहीं तैयार फसल को समय पर बाजार तक भेजना भी संभव होगा। ग्रामीण महेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह, रघुवीर सिंह, देवराज सिंह, दिगंबर सिंह और ईत्ता सिंह सहित अन्य लोगों का कहना है कि गांव में मेहनत करने वाले लोगों की कमी नहीं है। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां खेती और बागवानी के लिए अनुकूल हैं और ग्रामीण वर्षों से अपनी जमीन को उपजाऊ बनाए रखने में जुटे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सड़क, परिवहन और बाजार जैसी सुविधाएं उपलब्ध हो जाएं तो गांव की कृषि और बागवानी को नई पहचान मिल सकती है। सेब, आलू, चौलाई और स्वादिष्ट राजमा के उत्पादन को संगठित तरीके से बाजार तक पहुंचाकर किसानों की आय में वृद्धि की जा सकती है।
उनका कहना है कि पहाड़ में पलायन रोकने के लिए केवल योजनाओं की घोषणा करना पर्याप्त नहीं है। गांवों तक सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाएं पहुंचाना जरूरी है।
ग्रामीणों का दर्द इस बात में साफ झलकता है कि यदि समय रहते गांव तक सड़क पहुंच जाती तो शायद इतनी बड़ी संख्या में लोगों को पलायन के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता।
सड़क केवल एक मार्ग नहीं होती, बल्कि गांव के विकास की जीवनरेखा होती है। सड़क से ही बच्चे बेहतर स्कूलों तक पहुंचते हैं, बीमार समय पर अस्पताल पहुंचते हैं, किसान अपनी फसल बाजार तक पहुंचाते हैं और युवाओं के लिए रोजगार की नई संभावनाएं पैदा होती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि गांव की आबादी को बचाने और पलायन को रोकने के लिए अभी भी समय है। यदि गांव तक सड़क पहुंचे और खेती-किसानी को बेहतर बाजार मिले तो लोग दोबारा अपने गांव और जमीन से जुड़ सकते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में बुनियादी सुविधाएं मजबूत हों तो युवा परिवार गांव में रहने के लिए प्रेरित होंगे और भविष्य में गांव फिर से आबाद हो सकता है।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि यदि गांव को सड़क सुविधा से जोड़ दिया जाए तो यहां की खेती और बागवानी को नई दिशा मिल सकती है। स्थानीय स्तर पर उत्पादित स्वादिष्ट राजमा, सेब, आलू और चौलाई को बेहतर बाजार मिल सकता है। इससे किसानों को उचित मूल्य मिलेगा और युवाओं के लिए खेती को रोजगार के रूप में अपनाने की संभावना बढ़ेगी। स्थानीय कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग और विपणन से भी गांव की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है। ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ की खेती में आज भी अपार संभावनाएं हैं। जरूरत केवल सुविधाओं, परिवहन, बाजार और सरकारी सहयोग की है। ग्रामीण महेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह, रघुवीर सिंह, देवराज सिंह, दिगंबर सिंह और ईत्ता सिंह सहित अन्य लोगों ने शासन -प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गांव की सड़क समस्या का समाधान करने की मांग की है। आज जब ग्रामीण अपने हाथों से सड़क की कटिंग कर रहे हैं तो यह केवल मिट्टी और पत्थर काटने का काम नहीं है। यह उस गांव को फिर से विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश है, जहां कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं और जहां आज भी सेब की मिठास, स्वादिष्ट राजमा, आलू और चौलाई की फसलें पहाड़ की संभावनाओं की कहानी कहती हैं। ग्रामीणों की बस एक उम्मीद है—विकास की सड़क उनके गांव तक भी पहुंचे, ताकि पलायन से सूना हो रहा यह गांव एक बार फिर आबाद हो सके।



