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जयकारों के बीच कुरुड़ सिद्धपीठ मंदिर से मां नंदा की बड़ी जात शुरू हुई

चमोली। 12 साल के लंबे इंतजार के बाद शनिवार को वह घड़ी आई, जब मां नंदा के मायके से कैलाश के लिए डोली उठी। ढोल दमाऊं की थाप, जागरों की गूंज और जय मां नंदा के जयकारों के बीच कुरुड़ के सिद्धपीठ मंदिर से मां नंदा की बड़ी जात शुरू हुई। डोली के आगे बढ़ते ही श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। खासकर ध्याणियां मां नंदा को बेटी मानकर उनकी विदाई के समय अपने आंसू नहीं रोक सकीं। किसी ने हाथ जोड़कर मां से परिवार की खुशहाली मांगी तो किसी ने बेटी की तरह उन्हें विदा करते हुए भावुक होकर मंगल गीत गाए। सिद्धपीठ कुरुड़ से मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली, कुरुड़-दशोली की नंदा डोली और बंड क्षेत्र की नंदा डोली अपने-अपने पौराणिक यात्रा मार्गों से हिमालय की ओर रवाना हुईं। डोलियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी यात्रा पर निकले। नंदा की बड़ी जात के शुरू होते ही सीमांत जनपद चमोली एक बार फिर मां नंदा की भक्ति में डूब गया है। मां नंदा को पहाड़ में बेटी का स्वरूप माना जाता है। गांव उनका मायका और कैलाश उनका ससुराल। इसलिए नंदा की डोली की विदाई यहां महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि बेटी को मायके से विदा करने की सदियों पुरानी भावनात्मक परंपरा है। यही वजह रही कि डोली के प्रस्थान के समय पूरा वातावरण श्रद्धा के साथ विरह में डूब गया। डोली अब कैलाश की ओर बढ़ चली है। पीछे रह गया है मायका, ध्याणियों की नम आंखें और एक ही उम्मीदकृबेटी नंदा फिर लौटेंगी। 12 साल बाद शुरू हुई इस यात्रा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि पहाड़ के लिए मां नंदा सिर्फ आराध्य देवी नहीं, बल्कि हर घर की बेटी हैं।

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